शुक्रवार, 7 सितंबर 2007

सपनों के टूटे कांच चुभते हैं दिल में

जब सपने टूटते हैं तो तकलीफ होती है
सपनों के टूटे कांच चुभते हैं दिल में
लेकिन हर बार की तरह हम सपने देखते हैं
और महसूस करते हैं उस चुभन को
मैने भी हर बार यही किया
और जगा दिया गया हर बार सपनों के टूटने से पहले
लेकिन क्‍या मुझे कोई हक नहीं है अपने सपनों को एक नाम देने का
नहीं मुझे कोई हक नहीं है
मेरे सपनों की नींव किसी की सच्‍चाई पर नहीं हो सकती है
हर बार मैं गलती करता हूं सपने देखना का
लेकिन अब नही
हां मुझे कोई हक नहीं है सपने देखने को

1 टिप्पणी:

  1. यह सच है कि कविताओ का कोई सुर-ताल नहीं होता। वह पानी की तरह होती है, जिसमें भी डाल दो वही आकार ग्रहण कर लेती है, लेकिन आशीष तुम्‍हें कविताओ को और अलंकृत करना चाहिए, ताकि जो भयावह दौर चल पड़ा है, भाषा की दुर्गत का तुम उसका हिस्‍सा बनने से बच सको।

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