Thursday 3 December 2009

कौन है भोपाल गैस त्रासदी का जिम्‍मेदार




आज यानी 3 दिसंबर को भोपाल समेत पूरा देश और कह सकते हैं कि दुनिया में भी भोपाल गैस त्रासदी को याद किया जा रहा है। आज इस घटना को हुए 25 वर्ष बीत चुके हैं। बड़े नेता, एनजीओ और मीडिया हाउस इस त्रासदी को भुनाने में पीछे नहीं रहे हैं। सभी ने इसे त्रासद और हृदयविदारक की संज्ञाएं दीं, पर क्‍या किसी ने ये जहमत उठाई कि पीडि़तों का क्‍या हाल है। उनकी सुनवाई हो रही है या नहीं, उनके पुनर्वास का क्‍या हो रहा है। यूका (यूनियन कार्बाइड) परिसर से जहरीले रसायन कब हटाए जाएंगे। ये सब वो सवाल हैं जो आज भी अनुत्‍तरित हैं।

हर वर्ष नवंबर के आखिरी सप्‍ताह में कोई न कोई बड़ी हस्‍ती यहां आती है और सहानुभूति के शब्‍द कहकर चली जाती है। यहां रहने वालों को अब तक यदि कोई चीज बिना मांगे मिली है तो वो है आश्‍वासन, जिसकी हमारे देश में कोई कमी नहीं है। ऐसा लगता है कि शासन-प्रशासन और बाकी संस्‍थानों ने 3 दिसंबर को खानापूर्ति वाली तारीख मान लिया है, जिसे मनाना है। भोपाल मे स्‍थानीय अवकाश घोषित रहता है। तमाम सरकारी दफ्तर बंद रहते हैं।

गैस त्रासदी की 20वीं बरसी वाले साल मैंने भी कमोबेश वही किया जो हर साल किया जाता है। सारे मीडियाकर्मियों की तरह मैं भी वहां मंडराया, कुछ एक्‍सक्‍लूसिव खोजने के चक्‍कर में। लेकिन उस नरक को देखकर लगा कि जो कोई भी स्‍वर्णिम मध्‍यप्रदेश बनाने की बात कर रहा है, उसे एक बार यहां आकर लोगों से मिलना चाहिए और उनका दर्द जानना चाहिए।

यहां वल्‍लभ भवन के एअर कंडीशन कमरों में बैठकर गैस राहत एवं पुनर्वास की योजना बनाई जाती है, जो आजतक लागू ही नहीं हो पाई। उदाहरण विधवा कॉलोनी का है, जो यूका कारखाने से कुछ ही दूरी पर बसाई गई थी। यहां आजतक पीने के पानी की स्‍थाई व्‍यवस्‍था नहीं हो पाई है। 20वीं बरसी पर मैंने तत्‍कालीन मुख्‍यमंत्री के श्रीमुख से यह आश्‍वासन सुना था कि अगले एक महीने (3 जनवरी 2005) में यहां नगर निगम द्वारा पीने के पानी की स्‍थाई व्‍यवस्‍था कर दी जाएगी। लेकिन आजतक टैंकरों और जुगाड़ू व्‍यवस्‍था से ही काम चल रहा है।

ऐसा ही हाल गैस राहत अस्‍पतालों का भी है। बदहाली का आलम यह है कि मरीजों को यहां न तो उचित इलाज मिल रहा है और न ही दवाएं। मुआवजे की राश‍ि भी पीडि़तों को कम और गैर पीडि़तों को ज्‍यादा बंटी। हास्‍यापास्‍पद तो यह है कि भोपाल मेमोरियल हॉस्पिटल एंड रिसर्च सेंटर और देश के नामी विज्ञान संस्‍थान आजतक यह पता नहीं लगा सके कि गैस पीडि़तों का इलाज कैसे किया जाए। कौन सी दवा उनका इलाज कर पाएगी।

सबसे बुरा यह देखकर लगता है कि इस त्रासद दिन की बरसी भी राजनीति से अछूति नहीं रहती है। पिछले 25 वर्षों में कई मुख्‍यमंत्री आए और गए, कई प्रधानमंत्री आए और गए, पर आजतक सिर्फ आश्‍वासन ही मिला। भोपाल के बरकतउल्‍ला भोपाली भवन में एक सर्वधर्म सभा आयोजित करके, यूका के सामने प्रदर्शन करके और वारेन एंडरसन का पुतला जलाकर आखिर क्‍या हासिल हुआ है। ठोस नतीजों के लिए जिस इच्‍छाशक्ति की जरूरत है वो यहां के लोगों में नहीं है।

मेरा मानना है कि जिस प्रकार 26/11 की घटना के बाद मुंबई समेत पूरे देश मे लोगों ने आवाज बुलंद की थी और सरकार को मजबूरन जनता की आवाज सुननी पड़ी थी, वैसा ही 3 दिसंबर पर एक्‍शन के लिए भी करना चाहिए। वरना 25 तो छोडि़ए 50वीं बरसी आने तक भी कोई हल नहीं निकलेगा और यूका में पड़ा रासायनिक कचरा यूं ही वातावरण और लोगों को प्रभावित करता रहेगा।

यदि आप में से किसी का भोपाल आना हो तो एक बार यूका तरफ जरूर जाएं। सारी सच्‍चाई से आप खुद ब खुद वाकिफ हो जाएंगे।

Monday 30 November 2009

विज्ञापन से मीडिया की आय में हर साल इजाफा

देश में मीडिया समूहों को विज्ञापनों से होने वाली कमाई में हर साल इजाफा हो रहा है। अभी प्रिंट मीडिया विज्ञापनों के मामले में टेलीविजन से आगे है, पर टीवी चैनलों की विज्ञापनों से कमाई भी बढती जा रही है।
यह जानकारी केन्द्रीय सूचना एवं प्रसारण राज्य मंत्नी सीएम जातुया ने सोमवार को राज्यसभा में प्रश्नकाल के दौरान दी। उन्होंने बताया कि मीडिया ने विज्ञापनों से 2006 में 165 अरब रुपए की कमाई की तो 2007 में 196 अरब 60 करोड़ की कमाई की और 2008 में करीब 221 अरब 60 करोड़ रुपए की कमाई की।
किसने कितना कमाया:
इलेक्‍ट्रॉनिक मीडिया: 60 अरब 50 करोड़ (2009)
* 2007 में 71 अरब 10 करोड़
* 2008 में 82 अरब 50 करोड़ रुपए

प्रिंट मीडिया: 84 अरब 90 करोड़ (2009)
* 2007 में 100 अरब 20 करोड़
* 2008 में 108 अरब 40 करोड़ रुपए

रेडियो मीडिया: * 2006 में 6 अरब
* 2007 में 7 अरब 40 करोड़

वेब मीडिया: इंटरनेट को वर्ष 2006 में दो अरब
* 2007 में तीन अरब 90 करोड़ तथा
* 2008 में करीब 6 अरब 20 करोड़ रुपए की कमाई विज्ञापन से की।

Saturday 12 September 2009

दिनेश दीनू ने पीपुल्स इंदौर को कहा बाय

कुछ ही महीने पहले पीपुल्स समाचार समूह ने अपने इंदौर संस्करण के लिए आईनेक्स्ट से आए दिनेश दीनू को नियुक्त किया था। दिनेश जी ने वहां शुरुआती नियुक्तियां भी की। लेकिन दो दिन पहले प्रबंधन ने उन्हें भोपाल आने के लिए कह दिया। दीनू जी ने भोपाल आने के बदले इस्तीफा दे दिया।

सूत्रों की मानें तो तीन संपादकों और काम के बंटवारे को लेकर ऐसी परिस्थितियां बनीं कि उनका जाना तय माना जा रहा था। दैनिक भास्कर जबलपुर के संपादक रह चुके विकास मिश्रा जी जो अब तक ज्वाइंट एडिटर थे उन्हें संपादक का पद सौंपा गया है। ऐसी खबरें हैं कि पत्रिका इंदौर व दैनिक भास्कर इंदौर के कुछ रिपोर्टर भी पीपुल्स का रुख कर सकते हैं।

  • राजस्थान पत्रिका के कोटा संस्करण से ईशान अवस्थी जी ने भी पीपुल्स ज्वाइन कर लिया है। ईशान जी कोटा से पहले पत्रिका समूह के अखबार न्यूज टुडे के इंदौर संस्करण में थे। उनका ट्रांसफर पिछले साल कोटा कर दिया गया था।
  • नवदुनिया भोपाल के बिजनेस रिपोर्टर पंकज भारती ने भी पीपुल्स ज्वाइन कर लिया है। नवदुनिया के पहले पंकज भास्कर डॉट कॉम मुंबई में थे।

Wednesday 29 July 2009

फिर भी कविता लिख लेता हूँ...

सुबह से लेकर रात तक... भागती रहती है जिंदगी ..
कभी इस खबर.. कभी उस खबर...
इनके बीच मै बेखबर सा होकर घूमता रहता हूँ...
बदबूदार राजनीति... नालियों में सड़ती नवजात बेटियाँ.. सेलेब्रेटियों के पाखंड..

चौराहे पर एक कट चाय पीकर... फिर भी कविता लिख लेता हूँ...

निर्मोही सा... अब ये मन... नहीं पसीजता किसी घटना से...
मोहल्ले के कुत्ते की मौत पर.... मै कभी बहुत रोया था....
अब नर संहारो से भी कोई सरोकार नहीं ....

फिर भी देर रात घर लौटते वक़्त..
मै मुंडेर पर ..चिडियों का पानी भर देता हूँ...

परिभाषा काल की मुझे नहीं मालूम.. जाने कब क्या हो...
कोई मिला तो हंस लिए... न मिला तो चल दिए...
पदचाप अपने ...निशब्द भी मिले... तो यू ही कुछ गुनगुना लिया...
षडयंत्र, राजनीति, विरोध, प्रदर्शन... जीवन के अब सामान्य पहलू से हो चले...

बचपन...की याद बहुत आती है... खेतो की मिट्टी में गुजरा था बचपन..
अब धमाको में उड़े.. बच्चो का खून...
अपनी खबर देखते-पढ़ते... करवट बदलते रात काट देता हूँ मैं
मैं फिर भी कविता लिख लेता हूँ

प्रिय मित्र अंकित श्रीवास्तव की यह रचना पढ़िए। अंकित दैनिक भास्कर समाचार समूह की भोपाल कॉरपोरेट एडिटोरियल डेस्क पर कार्यरत हैं।