सोमवार, 1 अक्तूबर 2007

यह भी सच है


संयुक्त राष्ट्र ने कहा है कि दुनियाभर में आज भी एक अरब से अधिक लोग शहरी स्लम बस्तियों में जीवन व्यतीत कर रहे हैं। यदि सरकारों ने समय रहते इन्हें नियंत्रित नहीं किया तथा इनके पुनर्वास की व्यवस्था नहीं की तो अगले 30 साल में इनकी संख्या दोगुनी हो जाएगी। संयुक्त राष्ट्र एक अक्टूबर को विश्व आवास दिवस के रूप में मनाता है।
संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के अनुसार इन शहरी बस्तियों में रहने वाले लोग भय, असुरक्षा, गरीबी और मानवाधिकारों से वंचित जीवन जी रहे हैं जहां मूलभूत आवश्यकताओं का भारी अभाव है तथा हिंसा व अपराध एक गंभीर समस्या बनती जा रही है।
संयुक्त राष्ट्र ने इस साल विश्व आवास दिवस का विषय या थीम एक सुरक्षित शहर ही वास्तविक शहर' चुना है। वास्तव में यह विषय मानव बस्तियों की हालत पर नजर डालता है। संयुक्त राष्ट्र ने शहरी सुरक्षा, सामाजिक न्याय खासतौर पर शहरी अपराध और हिंसा, बलात् निष्कासन, असुरक्षित शहरी निवास के साथ साथ प्रकृति व मनुष्यजन्य आपदाओं के प्रति जागरूकता और इस बारे में प्रयासों को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से ही एक 'सुरक्षित शहर ही वास्तविक शहर' विषय चुना है।
वर्तमान समय और परिस्थितियों में अधिकतर शहरों में भय और असुरक्षा का एक प्रमुख कारण अपराध और हिंसा है। संयुक्त राष्ट्र ने इस साल विश्व आवास दिवस-2007 के अंतरराष्ट्रीय आयोजन का नेतृत्व नीदरलैंड की राजधानी हेग शहर को सौंपा है। इस अवसर पर वहां एक सम्मेलन का आयोजन किया गया है, जिसमें सभी स्तर के पेशेवर लोगों को आमंत्रित किया गया है जो विकसित और विकासशील देशों में शहरी सुरक्षा और बचाव में आ रही चुनौतियों पर अपने विचार रखेंगे।


अब आप ही बताइए देश कैसी तरक्की कर रहा है।

1 टिप्पणी:

  1. भाई संयुक्तराष्ट्र संघ को जुबान हिलाने में कुछ नहीं लगता। एक अरब लोग स्लम में रह रहे हैं तो इसके लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदार कौन है। ये राष्ट्रसंघ सिर्फ दबे कुचले देशों को ही आंख दिखाता है। अमेरिका कितने लोगों के मुंह से निवाला छिन रहा है यह उसे नहीं दिखता? किसी भी देश में जिन क्षेत्रों में विकास होता है पापुलेशन इमीगऱेशन होता ही है। ऐसे में भरत जैसे देश में मुंबई, दिल्ली,चेन्नई, पूना, बैंगलोर जैसे शहरों में गरीब इलाकों के लोग रोजगार की तलाश में आते ही हैं। जब तक गांवों में रोजगार उपलब्ध नहीं होगा तब तक यह स्थिति बनी रहेगी। जो लोग उड़ीसा, महाराष्ट्र के रिमोट एरिया से आते हैं वो इन स्लम एरिया में बेहतर जीवन जीते हैं। अगर उनका जीवन स्तर उन गांवों में देखा जाए तो इससे भी बत्तर है। शहर के स्लम एरियाज में उन्हें दो वक्त की रोटी तो मिलती है, कम से कम रोजगार तो मिलता है लेकिन इससे उलट उनके गांवों में तो आत्महत्या को मजबूर होना पड़ता है। गांवों में जब तक रोजगार के अवसर उपलब्ध नहीं होंगे तब तक इन समस्याओं से निपटना मुश्किल होगा।

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