सोमवार, 12 नवंबर 2007

प्रलय...कोहराम...कत्ले आम.....फिर खामोशी.....और बस सन्नाटा

मुझे उसका नाम तो याद नहीं है लेकिन उससे मेरी पहली मुलाकात उस वक्त हुई कि जब लोग एक दूसरे के लिए जान देते थे. असीम प्रेम का सबके बीच. चारों और शान्ति और सभ्य समाज था. लेकिन ना जाने उसके जाने के बाद पूरी दुनिया ही तब्दील हो गई. लोग एक दूसरे के खून के प्यासे हो गए. लोग एक दूसरे को देख नहीं सकते हैं.. ऐसा क्यों हुआ. मुझे भी नहीं मालूम? लेकिन सालों बाद उसी ने बताया कि यह सब के पीछे किसका हाथ है. वो और कोई नहीं बल्कि वही थी जिससे मेरी पहली मुलाकात उस वक्त हुई थी जब चारों और शान्ति और खुश हाली थी. तो फिर अब क्यों नहीं ऐसा है ? वजह कुछ खास थी. उसने अपनी ज़िंदगी से ही नहीं बल्कि उससे भी दगा किया जिसकी वजह से आज वो इस जहाँ में थी...आखिर ऐसा क्यों किया इसने...? अरे यह क्या ? अचानक काले काले बादल छाने लगे...चारों और शोर...कोई कुछ करता क्यों नहीं?...प्रलय...कोहराम...कत्ले आम.....फिर खामोशी.....और बस सन्नाटा ....................

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