शुक्रवार, 18 जून 2010

Blame Game बना एंडरसन का मामला

यूनियन कार्बाइड कॉरपोरेशन के तत्कालीन सीईओ वारेन एंडरसन को भगाने का मामला Blame Game का रूप ले चुका है। अगर कड़ी कड़ी जोड़ते हुए देखिए तो सारे रास्ते घूम फिर कर सत्ता के गलियारों में ही पहुंच रहे हैं। लेकिन खुद को इससे अलग करके पाक साफ बनने की कोशिश कर रहा है और आरोपों का कीचड़ दूसरे पर फेंक रहा है।

शुरुआत यहां से करते हैः
  • तत्कालीन पुलिस अधीक्षक स्वराज पुरी ने कहा कि उन्हें चीफ सेक्रेटरी ने आदेश दिया था
  • तत्कालीन भोपाल कलेक्टर मोती सिंह का कहना है कि उन्हें “ऊपर” से आदेश मिला था।
  • राज्य में ऊपर का मतलब सीएम हाउस/सेक्रेटिरिएट से होता है।
  • सीबीआई के पूर्व संयुक्त महानिदेशक बी आर लाल का कहना है कि उन्हें केंद्र सरकार से एंडरसन जांच मामले में “गो स्लो यानी धीरे चलो” का आदेश मिला था।
  • उस समय के स्टेट प्लेन के पायलट का कहना है कि उन्हें सीएम हाउस से आदेश मिला था कि स्टेट प्लेन से एंडरसन को दिल्ली पहुंचाओ।
  • धीरे से अर्जुन सिंह को निशाने पर लिया गया।
  • वो चुप रहे और चुप ही हैं।
  • तत्कालीन पीएम राजीव गांधी का नाम भी शामिल किया गया। जबकि उस समय उन्हें प्रधानमंत्री मंत्री बने महज कुछ हफ्ते ही हुए थे।
  • पार्टी सांसत में फंसी।
  • प्रवक्ताओं ने कहा कि न तो पीएम और न ही सीएम दोषी।
  • “सिस्टम” ने भगाया एंडरसन को।
  • अब नरसिम्हाराव की ओर सारे आरोप मोड़ दिए गए हैं।
  • पूर्व विदेश सचिव एम के रसगोत्रा का दावा, तत्कालीन गृहमंत्री पीवी नरसिम्हाराव ने दिया था आदेश
  • नरसिम्हाराव के बेटे का जवाब, उनके पिता अकेले दोषी नहीं हैं इसमें।
पूरा मामला घूमकर वहीं लौट आया जहां था।


भोपाल को चाहिए जवाब

5 टिप्‍पणियां:

  1. In sab Baton se ek cheez nikal kar samne aati woh yeh ki kis tarah ke netaon ko hum log chun kar aage bhej rahe hain.

    Chote profile walon ki baat na karen to PM or CM to tab itne corrupt the to ab kya halat honge aur jane kahan kahan desh bech rahe honge

    KYA koi media channel iske liye SMS start nahi kar sakta , jo choti choti baton ko SMS par dalne ke liye dinbhar chillate hain

    Ab to lagta hai ki system hi nahi ek common man bhi utna hi corrupt ho gaya hai.

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  2. वाह ! पूरे घटनाक्रम और उस से जुड़े लोगों को दर्शाने की शैली नवीन और सराहनीय है. सचमुच में कोई भी जिम्मेदार नहीं है अपने हिसाब से, लगता है सिस्टम ही जिम्मेदार था.

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  3. the blame game being played out is really a bad joke, esp. as at that time, the system was lead by a single political force, at all levels.
    but the most interesting bit which can be deciphered from it all is that the government of the time did not have a clue of the gravity of the situation and the cause & effect relationship that the media is now commenting on.
    it could have been naivety of the concerned people, or pure ignorance, that the key culprits got away, that the people affected were not taken care off, etc, etc. but now it is too late to amed any of that...
    i feel that the media today, as well as the politician should not dwell any further in the ghosts of the past, instead a more positive approach is required.
    we need to take care of the people still suffering, clean-up the toxic site and make sure that our legislation & "system" is now updated and equipped well enough to never let another of such tragedies to take place, and additionally deal with it in an efficient and proper manner.

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  4. सही कहा आपने दोस्तों। दरअसल इस तरह की हरकतों के चलते ही हमारे देश में राजनेताओं और सियासत से लोगों का भरोसा उठ रहा है। हालात तो आप सब देख रहे हैं। चुनावों को मतदान का प्रतिशत गिरता जा रहा है। इसकी वजह है कि लोगों को इन मक्कारों से कोई उम्मीद नहीं बची है। देश को गरीब की जोरू मान लिया है इन्होंने। जिसको मौका मिलता है, नोचने खरोंचने में लग जाता है और सत्ता बदलते ही ईमानदारी की ढपली बजाने लगता है।

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  5. श्री पाण्डेयजी शानदार जानकारी जुटाई है और मुर्दा लोगों को जगाने के लिए ही सही लेकिन इस प्रकार का आक्रोश प्रकट होना चाहिए. साधुवाद!
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    जिन्दा लोगों की तलाश! मर्जी आपकी, आग्रह हमारा!!

    काले अंग्रेजों के विरुद्ध जारी संघर्ष को आगे बढाने के लिये, यह टिप्पणी प्रदर्शित होती रहे, आपका इतना सहयोग मिल सके तो भी कम नहीं होगा।
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    उक्त शीर्षक पढकर अटपटा जरूर लग रहा होगा, लेकिन सच में इस देश को कुछ जिन्दा लोगों की तलाश है। सागर की तलाश में हम सिर्फ सिर्फ बूंद मात्र हैं, लेकिन सागर बूंद को नकार नहीं सकता। बूंद के बिना सागर को कोई फर्क नहीं पडता हो, लेकिन बूंद का सागर के बिना कोई अस्तित्व नहीं है।

    आग्रह है कि बूंद से सागर में मिलन की दुरूह राह में आप सहित प्रत्येक संवेदनशील व्यक्ति का सहयोग जरूरी है। यदि यह टिप्पणी प्रदर्शित होगी तो निश्चय ही विचार की यात्रा में आप भी सारथी बन जायेंगे।

    हम ऐसे कुछ जिन्दा लोगों की तलाश में हैं, जिनके दिल में भगत सिंह जैसा जज्बा तो हो, लेकिन इस जज्बे की आग से अपने आपको जलने से बचाने की समझ भी हो, क्योंकि जोश में भगत सिंह ने यही नासमझी की थी। जिसका दुःख आने वाली पीढियों को सदैव सताता रहेगा। गौरे अंग्रेजों के खिलाफ भगत सिंह, सुभाष चन्द्र बोस, असफाकउल्लाह खाँ, चन्द्र शेखर आजाद जैसे असंख्य आजादी के दीवानों की भांति अलख जगाने वाले समर्पित और जिन्दादिल लोगों की आज के काले अंग्रेजों के आतंक के खिलाफ बुद्धिमतापूर्ण तरीके से लडने हेतु तलाश है।

    इस देश में कानून का संरक्षण प्राप्त गुण्डों का राज कायम हो चुका है। सरकार द्वारा देश का विकास एवं उत्थान करने व जवाबदेह प्रशासनिक ढांचा खडा करने के लिये, हमसे हजारों तरीकों से टेक्स वूसला जाता है, लेकिन राजनेताओं के साथ-साथ अफसरशाही ने इस देश को खोखला और लोकतन्त्र को पंगु बना दिया गया है।

    अफसर, जिन्हें संविधान में लोक सेवक (जनता के नौकर) कहा गया है, हकीकत में जनता के स्वामी बन बैठे हैं। सरकारी धन को डकारना और जनता पर अत्याचार करना इन्होंने कानूनी अधिकार समझ लिया है। कुछ स्वार्थी लोग इनका साथ देकर देश की अस्सी प्रतिशत जनता का कदम-कदम पर शोषण एवं तिरस्कार कर रहे हैं।

    अतः हमें समझना होगा कि आज देश में भूख, चोरी, डकैती, मिलावट, जासूसी, नक्सलवाद, कालाबाजारी, मंहगाई आदि जो कुछ भी गैर-कानूनी ताण्डव हो रहा है, उसका सबसे बडा कारण है, भ्रष्ट एवं बेलगाम अफसरशाही द्वारा सत्ता का मनमाना दुरुपयोग करके भी कानून के शिकंजे बच निकलना।

    शहीद-ए-आजम भगत सिंह के आदर्शों को सामने रखकर 1993 में स्थापित-भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (बास)-के 17 राज्यों में सेवारत 4300 से अधिक रजिस्टर्ड आजीवन सदस्यों की ओर से दूसरा सवाल-

    सरकारी कुर्सी पर बैठकर, भेदभाव, मनमानी, भ्रष्टाचार, अत्याचार, शोषण और गैर-कानूनी काम करने वाले लोक सेवकों को भारतीय दण्ड विधानों के तहत कठोर सजा नहीं मिलने के कारण आम व्यक्ति की प्रगति में रुकावट एवं देश की एकता, शान्ति, सम्प्रभुता और धर्म-निरपेक्षता को लगातार खतरा पैदा हो रहा है! हम हमारे इन नौकरों (लोक सेवकों) को यों हीं कब तक सहते रहेंगे?

    जो भी व्यक्ति स्वेच्छा से इस जनान्दोलन से जुडना चाहें, उसका स्वागत है और निःशुल्क सदस्यता फार्म प्राप्ति हेतु लिखें :-
    डॉ. पुरुषोत्तम मीणा, राष्ट्रीय अध्यक्ष
    भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (बास)
    राष्ट्रीय अध्यक्ष का कार्यालय
    7, तँवर कॉलोनी, खातीपुरा रोड, जयपुर-302006 (राजस्थान)
    फोन : 0141-2222225 (सायं : 7 से 8) मो. 098285-02666
    E-mail : dr.purushottammeena@yahoo.in

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